द्रौपदी मुर्मू से अच्छे रिश्ते के चलते क्या JMM देगी NDA का साथ? BJP के दांव पर विपक्ष को झटका !

JMM ON PRESIDENT ELECTION 2022

सार
एनडीए की ओर से आदिवासी उम्मीदवार को उतारे जाने के बाद शिबू सोरेन की अगुआई वाली पार्टी अपना स्टैंड बदल सकती है। यदि द्रौपदी मुर्मू चुनाव जीतती हैं तो वह देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति होंगी।

Jharkhand News : आजादी के बाद देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद के लिए पहली बार किसी आदिवासी को आगे कर राजग ने एक तीर से कई निशाना साधा है। देशभर में आदिवासियों की आबादी 12 करोड़ से अधिक है और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर इनकी भागीदारी अन्य समुदायों की अपेक्षा कम है। ऐसे में राजग ने द्रौपदी मुर्मू का नाम आगे बढ़ाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसके एजेंडे में समरस और सर्वस्पर्शी समाज की परिकल्पना सर्वोपरि है। उसका समाज के हर तबके के उन्नयन में विश्वास है।

इसका राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक तौर पर पड़ेगा। वैसे दल जिनका आधार भाजपा विरोध की राजनीति रही है, वे इसे लेकर राजग के साथ आ सकते हैं। इसकी चर्चा झारखंड से ही करते हैं। द्रौपदी मुर्मू का नाम राज्यपाल के लिए पहली बार आश्चर्यजनक तौर पर आया था। दिसंबर, 2014 में विधानसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद भाजपा ने सरकार बनाई तो पहली बार गैर आदिवासी मुख्यमंत्री का प्रयोग किया गया। रघुवर दास पद पर काबिज हुए। इसकी भरपाई के लिए राज्यपाल के पद पर द्रौपदी मुर्मू की नियुक्ति की गई।

संताल आदिवासी समुदाय से आने वाली मुर्मू ने अपने कार्यकाल में तब विपक्ष की राजनीति करने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा को भी प्रभावित किया। राष्ट्रपति चुनाव में इसका असर पड़ सकता है। झारखंड में सत्ता पर काबिज झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायकों की संख्या 30 है। मोर्चा के पास लोकसभा में एक और राज्यसभा में एक सदस्य हैं। मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन और द्रौपदी मुर्मू के बीच बेहतर रिश्ते हैं।

ऐसे में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चला रहे हेमंत सोरेन राजग प्रत्याशी का समर्थन करने के लिए आगे आ सकते हैं। अगर उन्होंने इसके विपरीत निर्णय लिया तो भाजपा को उन्हें कठघरे में खड़ा करने का मौका मिलेगा। लिहाजा उनके लिए यह धर्मसंकट की स्थिति होगी। अगर वे राजग के साथ जाएंगे तो कांग्रेस असहज होगी। विपक्ष का साथ देने पर हेमंत सोरेन को भविष्य में राजनीतिक नुकसान का डर सताएगा।

JMM को छवि की चिंता
पार्टी के एक नेता ने कहा, ”जब समुदाय (आदिवासी) के लिए कुछ महत्वपूर्ण हो रहा है तो खुद को दूसरे पक्ष में देखना वैचारिक रूप से मुश्किल होगा। यद्यपि यशवंत सिन्हा भी झारखंड के नेता हैं, लेकिन मुर्मू को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा, खासकर तब जब बीजेपी जैसे दल ने समर्थन देकर सिन्हा की जीत को और ज्यादा मुश्किल बना दिया है।” पार्टी नेताओं का कहना है कि मुर्मू का सोरेन परिवार से व्यक्तिगत रिश्ता निर्णय में अहम भूमिका निभाएगा।

दोनों परिवार में मधुर संबंध
जेएमएम के एक नेता ने कहा, ”दोनों परिवारों में घनिष्टता है। ओडिशा के मयूरभंज जिले में सोरेन के कई पारिवारिक रिश्ते हैं, जहां से मुर्मू आती हैं। हमंत सोरेन की पत्नी सहित शिबू सोरेन की दो बहुएं इसी इलाके से हैं। हेमंत की बहन का विवाह भी उसी इलाके में हुआ है। यह सब मुर्मू का पलड़ा भारी बनाता है। हालांकि, अभी अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है।”

मुर्मू ने भाजपा के कानून को कर दिया था खारिज
मुर्मू ने राज्यपाल के रूप में झारखंड में तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा लाए गए भूमि किरायेदारी कानून में संशोधन को खारिज कर दिया था। इसके बाद जेएमएम ने भाजपा को आदिवासी विरोधी बताते हुए आंदोलन की शुरुआत की थी। इसके बाद 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में जेएमएम, कांग्रेस और आरजेडी के गठबंधन ने जीत हासिल करके सरकार बनाई थी। 81 सदस्यों वाली विधानसभा में जेएमएम के 30 विधायक हैं। कांग्रेस के 17 और आरजेडी के एक विधायक का समर्थन सरकार को प्राप्त है।

20 जून 1958 को ओडिशा में एक साधारण संथाल आदिवासी परिवार में जन्मीं द्रौपदी मुर्मू ने 1997 में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी. वह 1997 में ओडिशा के रायरंगपुर में जिला बोर्ड की पार्षद चुनी गई थीं. राजनीति में आने के पहले वह श्री अरविंदो इंटीग्रल एजुकेशन एंड रिसर्च, रायरंगपुर में मानद सहायक शिक्षक और सिंचाई विभाग में कनिष्ठ सहायक के रूप में काम कर चुकी है. वह ओडिशा में दो बार विधायक रह चुकी हैं और उन्हें नवीन पटनायक सरकार में मंत्री पद पर भी काम करने का मौका मिला था. उस समय बीजू जनता दल और बीजेपी के गठबंधन की सरकार थी. ओडिशा विधानसभा ने द्रौपदी मुर्मू को सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए नीलकंठ पुरस्कार से भी नवाजा था.

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