संगठन का दावा- ‘भगवान जगन्नाथ का है कोहिनूर हीरा’, ब्रिटेन से वापसी के लिए राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन

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सार
पुरी स्थित संगठन, श्री जगन्नाथ सेना ने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन सौंपा है. इसमें 12वीं शताब्दी के मंदिर में हीरे को वापस लाने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए उनके हस्तक्षेप की मांग की गई है.

मुख्य बातें
कोहिनूर 105 कैरेट का बड़ा सा बेशकीमती हीरा
14वीं सदी की शुरुआत में दक्षिण भारत में कहीं मिला था
प्रिंस चार्ल्स की पत्नी के पास अब जाएगा यह बेरंग हीरा

Kohinoor Diamond: ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की मौत हो चुकी है। उनकी मौत के बाद से ही सोशल मीडिया पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है और भारत के यूजर्स ने कोहिनूर हीरे की मांग शुरू कर दी है। इसी बीच ओडिशा स्थित जगन्नाथ सेना ने दावा किया है कि कोहिनूर हीरा मूल रूप से भगवान जगन्नाथ का है और उन्होंने इसकी मांग की है।

कोहिनूर भगवान जगन्नाथ का?
दरअसल, जगन्नाथ सेना ने दावा किया है कि कोहिनूर भगवान जगन्नाथ का था। इतना ही नहीं जगन्नाथ सेना ने हीरा वापस लाने में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्तक्षेप की भी मांग की है। राष्ट्रपति को सौंपे गए एक ज्ञापन में जगन्नाथ सेना ने 12वीं शताब्दी के प्रसिद्ध पुरी मंदिर में कोहिनूर हीरे को वापस लाने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की मांग की है।

रणजीत सिंह ने जगन्नाथ को दान किया था!
जगन्नाथ सेना संयोजक प्रिया दर्शन पटनायक ने एक ज्ञापन में कहा कि कोहिनूर हीरा जगन्नाथ भगवान का है लेकिन अब यह इंग्लैंड की महारानी के पास है। कृपया हमारे प्रधानमंत्री से भगवान जगन्नाथ के लिए इसे भारत लाने के लिए कदम उठाने का अनुरोध है। उन्होंने कहा कि महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी इच्छा से इसे भगवान जगन्नाथ को दान कर दिया था।

ब्रिटेन ने देने से हमेशा इनकार किया
फिलहाल अब ब्रिटेन की महारानी की मौत के बाद कोहिनूर एक बाद फिर चर्चा में है। भारत में कोहिनूर को वापस लाने की कई बार मांग उठ चुकी है। लेकिन ब्रिटेन ने यह हीरा देने से हमेशा इनकार किया है। एक अनुमान के मुताबिक कोहिनूर की कीमत करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये है।

दुनिया के सबसे कीमती रत्नों में से एक
कोहिनूर को दुनिया के सबसे कीमती रत्नों में से एक माना जाता है। माना जाता है कि साल 1310 में कोहिनूर आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में खातिया वंश के राज के दौरान खुदाई में मिला था।

महारानी एलिजाबेथ द्वितीय को भी भेजा गया था पत्र
पटनायक ने कहा कि उन्होंने इस संबंध में महारानी को एक पत्र भी भेजा था, जिसके बाद उन्हें 19 अक्टूबर, 2016 को बकिंघम पैलेस से एक पत्र मिला था, जिसमें उन्हें इस संबंध में सीधे ब्रिटेन सरकार से अपील करने के लिए कहा गया था. पत्र में लिखा था, ‘‘महामहिम अपने मंत्रियों की सलाह पर काम करती हैं और हमेशा गैर-राजनीतिक रहती हैं.’’उन्होंने कहा कि उस पत्र की एक प्रति राष्ट्रपति को दिए गए ज्ञापन के साथ संलग्न की गई है. यह पूछे जाने पर कि वह इस मुद्दे पर छह साल तक चुप क्यों रहे, पटनायक ने कहा कि उन्हें इंग्लैंड जाने के लिए वीजा नहीं दिया गया था, जिसके कारण वह ब्रिटेन सरकार के साथ इस मामले को आगे नहीं बढ़ा सके.

श्री जगन्नाथ सेना का दावा जायज है
इतिहासकार और शोधकर्ता धीर ने कहा कि श्री जगन्नाथ सेना का दावा जायज है, लेकिन हीरे के, महाराजा रणजीत सिंह के वारिस, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे कई अन्य दावेदार भी हैं.इतिहासकार ने कहा, ‘‘महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी मौत से पहले अपनी वसीयत में लिखा था कि उन्होंने कोहिनूर हीरा भगवान जगन्नाथ को दान कर दिया है. इस दस्तावेज को ब्रिटेन की सेना के एक अधिकारी ने प्रमाणित किया था, जिसका प्रमाण दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में है.’’

कोहिनूर हीरा वापस लाने का मुद्दा 2016 में उठाया गया था
बता दें कि ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (बीजद) के नेता एवं सांसद भूपिंदर सिंह ने हीरा वापस लाने का मुद्दा 2016 में राज्यसभा में उठाया था.पुरी से विधायक एवं भाजपा नेता जयंत सारंगी ने भी कहा कि वह इस मामले को ओडिशा विधानसभा में उठाएंगे.

पंजाब के तत्कालीन शासकों ने ‘ईस्ट इंडिया’ कंपनी को दिया था हीरा
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कुछ साल पहले एक आरटीआई (सूचना का अधिकार के तहत पूछे गए) प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था कि कोहिनूर हीरा लगभग 170 साल पहले अंग्रेजों को ‘‘सौंपा नहीं गया’’ था, बल्कि लाहौर के महाराजा ने इसे इंग्लैंड की तत्कालीन महारानी को ‘‘समर्पित’’ किया था.भारत सरकार का इस मामले में उच्चतम न्यायालय में रुख था कि करीब 20 करोड़ डॉलर की कीमत का हीरा न तो ब्रिटिश शासकों द्वारा चुराया गया था और न ही ‘‘जबरन’’ लिया गया था, बल्कि पंजाब के तत्कालीन शासकों ने इसे ‘ईस्ट इंडिया’ कंपनी को दिया था.

कोहिनूर को दुनिया के सबसे कीमती रत्नों में से एक माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि यह 14वीं शताब्दी में दक्षिण भारत की कोल्लूर खदान में कोयला खनन के दौरान मिला था.

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